अब बद्रीनाथ धाम में दिखेगा अदभुद नजारा, भगवान बद्रीविशाल के साथ- साथ अब होगें बद्री वन के भी दर्शन

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Reported by Anuj Awasthi

On 19 Oct 2020
अब बद्रीनाथ धाम में दिखेगा अदभुद नजारा, भगवान बद्रीविशाल के साथ- साथ अब होगें बद्री वन के भी दर्शन

बदरीनाथ धाम में अब राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे ही श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बद्री वन देखने को मिलेगा। वन अनुसंधान संस्थान ने धाम के आसपास पाई जाने वाली बद्री तुलसी सहित अन्य प्रजातियों को लेकर एक एकड़ क्षेत्र में यह वन विकसित किया है। बद्री तुलसी के साथ ही बद्री फल, बद्री वृक्ष और भोजपत्र भी धार्मिक रूप से बदरीनाथ धाम से जुड़े हुए हैं। इनको देखने के लिए लोगों को आसपास के क्षेत्र में खासा घूमना पड़ता है।मसलन भोजपत्र का जंगल ही बदरीनाथ से करीब 12 किलोमीटर दूर है।

अब बदरीनाथ धाम में विकसित किए गए बद्री वन में यह चारों एक साथ देखने को मिल सकेंगे।वन अनुसंधान केंद्र के मुताबिक इन वनस्पतियों का उल्लेख आदि गुरु शंकराचार्य ने भी किया था और इन वनस्पतियों के आधार पर ही उन्होंने बदरीनाथ धाम के आसपास के क्षेत्र को बद्री वन का नाम दिया था। वन अनुसंधान केंद्र के मुुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी ने कहा बद्री वन को विकसित करने के दो कारण हैं। एक बदरीनाथ धाम की धार्मिक मान्यताओं में पर्यावरण के मामलों को सबके सामने रखना और दूसरा इन वनस्पतियों का संरक्षण करना। चारों वनस्पतियों को एक ही स्थान पर दिखने से लोगों को जगह-जगह भटकना भी नहीं पड़ेगा।

बद्री वृक्ष (जुनिपरस मेक्रोपोडा) इसके फलों और पत्तियों में एक अलग तरह की सुगंध होती है। इस सुगंध के कारण ही इसका उपयोग धूप बनाने में होता है। बौद्ध धर्म में भी इस पेड़ को पवित्र माना जाता है। कई रोगों के उपचार में भी यह काम आता है।बद्री फल (हिपोपाई सालसीफोलिया) 2000 से लेकर 3700 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाने वाला यह छोटा पेड़ बेहद उपयोगी है। इससे उच्च गुणवत्ता का तेल बनता है, जिसका औषधीय उपयोग होता है। मान्यता है कि बद्रीनाथ में भगवान विष्णु इसी को खाया करते थे।

बद्री तुलसी (ओरिगेनम वलगेर) यह तुलसी मुख्य रूप से बदरीनाथ और उसके आसपास के क्षेत्र में ही पाई जाती है। इसका उपयोग बद्री भगवान की पूजा में भी किया जाता है। अन्य तुलसियों की तुलना में यह तुलसी करीब 12 गुना अधिक कार्बन अवशोषित करती है।भोज पत्र (बेतुला यूटिलिस) कभी बदरीनाथ में भोजपत्र खासी संख्या में पाया जाता था। इस वृक्ष की छाल का उपयोग लिखने के लिए किया जाता था। पूर्व में पैदल यात्रा पर बदरीनाथ जाने वाले यात्री पांवों को घावों से बचाने के लिए भी इस पेड़ की छाल का इस्तेमाल करते थे।

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