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कृषि कानून विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कृषि कानून के अमल पर रोक लगाए केंद्र अन्यथा हम लगाएंगे रोक, किसानों से पूछा क्या रास्तों से हटेंगे

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Reported by Awaaz Desk

On 12 Jan 2021
कृषि कानून विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कहा कृषि कानून के अमल पर रोक लगाए केंद्र अन्यथा हम लगाएंगे रोक, किसानों से पूछा क्या रास्तों से हटेंगे

किसानों और केंद्र सरकार के बीच नए कृषि कानून का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में भी खूब गरमाया,पिछले 47 दिनों से सरकार और किसानों के बीच हो रही बातचीत अब तक बेनतीजा ही साबित हुई है ,जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की शीर्ष अदालत ने भी 11 जनवरी को केंद्र सरकार को जमकर फटकार लगाई और कहा कि केंद्र सरकार कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाए ।चीफ जस्टिस एसए बोबड़े की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि केंद्र ने कृषि बिल के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन को सही तरह से हैंडल नही किया,अब हमें इस मामले में एक्शन लेना होगा,कही ऐसा न हो कि आंदोलन एक दिन हिंसा में बदल जाये।केंद्र सरकार को इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए,सरकार चाहती तो कानून को लाने से पहले ही सभी बातों को बेहतर ढंग से कर सकती थी अगर कुछ भी गलत हुआ तो हम सब ज़िम्मेदार होंगे, हम नही चाहते कि हमारे हाथ किसी के भी खून से रंगे हो।केंद्र सरकार हमारे धैर्य पर हमें लेक्चर न दे हमने पहले ही काफी वक्त दे दिया है ताकि समस्या का समाधान हो सके।

अब इस मामले में बातचीत के लिए कमेटी का गठन किया जाएगा और कमेटी की अगुवाई सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस करेंगे।अगर किसी को भी कोई दिक्कत है तो वो बोल सकता है ।

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, किसान संगठन की ओर से एपी सिंह, दुष्यंत दवे आदि पेश हुए वहीं बिल के समर्थन करने वाले राज्य की ओर से हरीश साल्वे पेश हुए।सुप्रीम कोर्ट में सोमवार के दिन सुनवाई के दौरान क्या कुछ बहस चली चलिये वो भी जान लेते है।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे: केंद्र सरकार ने जिस तरह से मामले को लिया है वह निराशाजनक है। कानून लाने से पहले सरकार ने क्या सलाह मशवरा किया? कई राज्यों का विरोध जारी है। पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा था कि बातचीत चल रही है। लेकिन क्या बातचीत हुई। हम निराश हैं कि सरकार समस्या को सही तरह से हैंडल नहीं कर पाई है।

अटॉर्नी जनरल: एक्सपर्ट कमटी की सिफारिश पर कानून बनाया गया है। एपीएमसी के रिस्ट्रिक्शन को खत्म किया गया है। पिछली सरकार के समय से ये बात चल रही थी कि किसानों को मंडियों के बाहर का विकल्प दिया जाए। हम लगातार किसानों से बातचीत कर रहे हैं। ओपन मार्केट की बात पहले से थी और वही किया गया है और किसानों को मंडियों के बाहर का विकल्प दिया गया है।

चीफ जस्टिस: ये दलील कि पिछले सरकार के समय से ही ये बातें चल रही थी ये आपको समाधान नहीं देगा। आप क्या बातचीत कर रहे हैं क्या हल निकला? हमारा मकसद साफ है कि हम बातचीत से निदान चाहते हैं। इसलिए पिछली बार कहा था कि आप बात करें। आप क्यों नहीं कानून के अमल को होल्ड कर देते हैं। अगर आपके पास जिम्मेदारी का एहसास है तो आप कह सकते हैं कि आप कानून को होल्ड पर रख सकते हैं और हम कमेटी बनाएंगे और वह तय करेगा किस तरह से सभी को सुना जाए। लेकिन आप ऐसा जता रहे हैं जैसे कानून हर हाल में लागू होगा। हम कह रहे हैं कि हम समस्या का निदान चाहते हैं।

सॉलिसिटर जनरल: हम भी समाधान कर रहे हैं। हमारे पास कई संगठन किसान के आए जो कह रहे हैं कि कानून प्रोग्रेसिव है।

चीफ जस्टिस: हमारे पास ऐसा कोई पिटिशन नहीं है जो कानून को अच्छा बता रहा हो।

सॉलिसिटर जनरल: अगर कानून के अमल पर होल्ड किया गया तो बहुसंख्यक किसान कहेंगे कि कुछ लोगों के प्रदर्शन के कारण प्रोग्रेसिव कानून को रोक दिया गया।

चीफ जस्टिस: आप बताएं कि आप क्या कानून के अमल पर रोक लगाएंगे या फिर हम करेंगे। दिक्कत क्या है कानून को अभी स्थगित करने में ये बताएं। हम आपको पिछली बार भी कह चुके हैं कि कानन के अमल पर होल्ड किया जाए। लेकिन आपने जवाब नहीं दिया। लोग (किसान) आत्महत्या कर रहे हैं, प्रदर्शन स्थल पर जाड़े में वो सफर कर रहे हैं। हम नहीं समझ पा रहे हैं कि बुजुर्ग और महिलाएं भी वहां क्यों आए हैं। हम कमिटी का प्रस्ताव रख रहे हैं और हम ये भी प्रस्ताव करते हैं कि कानून के अमल पर रोक लगाई जाए। सरकार मुद्दों दर मुद्दों बात करना चाहती है और किसान कानून वापसी चाहते हैं। हम कानून के अमल पर स्टे करेंगे और ये स्टे तब तक होगी जब तक कमेटी बात करेगी ताकि बातचीत की सहूलियत पैदा हो।

चीफ जस्टिस: हम प्रोटेस्ट खिलाफ नहीं है। लेकिन कहना चाहते हैं कि अगर कानून पर स्टे होता है तो क्या किसान प्रदर्शन स्थल बदलेंगे ताकि वहां लोगों को सहूलियत हो। हमें डर है कि कहीं कोई और शांति न भंग करे। कुछ भी गलत हुआ तो सभी जिममेदार होंगे। हम नहीं चाहते कि खून से हाथ सने। किसान कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है। अपनी शिकायत वह कमेटी के सामने रख सकती हैं। कमेटी अपनी रिपोर्ट हमें देगी फिर कानून के बारे में आगे सुनवाई होगी।

साल्वे: अगर आप कानून के अमल पर स्टे करते हैं तो किसानों को कहा जाए कि वह प्रदर्शन रोक दें।

चीफ जस्टिस: सबकुछ एक ऑर्डर से प्राप्त नहीं होगा। किसान कमेटी के सामने जाएं। कोर्ट नहीं कहेगा कि कोई नागरिक प्रदर्शन न करे।

एमएल शर्मा: किसानों का प्रदर्शन शांति पूर्ण है लेकिन पुलिस ही बल प्रयोग कर रही है।

विवेक तन्खा(मध्य प्रदेश किसान): हम कानून अमल स्टे के प्रस्ताव का स्वागत करते हैं।

अटॉर्नी जनरल: सुप्रीम कोर्ट का पहले का जजमेंट है कि वह कानून पर स्टे नहीं कर सकती है।

चीफ जस्टिस: लेकिन ये पूरी तस्वीर नहीं है।

चीफ जस्टिस: हम दुख के साथ कह रहे हैं कि केंद्र सरकार ने समस्या के समाधान में समक्षता नहीं दिखाई है। आपने बिना पर्याप्त कंसलटेशन के कानून लागू कर दिया। कानून बनाया इसलिए गतिरोध हुआ है। आप इसका हल निकालें। हम जानते हैं कि मराठा रिजर्वेशन के अमल पर रोक लगाया गया और सुप्रीम कोर्ट ने ये रोक लगाई थी।

अटॉर्नी जनरल: 2014 का सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है कि कोर्ट कानून पर रोक नहीं लगा सकती। रोक तभी लग सकता है जब बिना अख्तियार के कानून बनाया गया हो या फिर मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता हो। कानून कमेटी की सिफारिश पर बनी है। दो तीन राज्य सिर्फ विरोध कर रहे हैं। हरियाणा के सीएम के साथ घटना घटी है जो दुर्भाग्यपूर्ण है। वह प्रदर्शन कारियों से बात करने जा रहे थे। लेकिन हिंसा की गई। कई जर्नलिस्ट भी घायल हुए।

चीफ जस्टिस: ऐसा न समझा जाए कि कानून तोड़ने वाले को प्रोटेक्ट किया जा रहा है। हम तो कानून तोड़ने से रोकने और हिंसा रोकने के लिए प्रस्ताव दे रहे हैं कि कमेटी बातचीत करे और कानून के अमल पर रोक हो।

अटॉर्नी जनरल: आप उनसे ये भी कहें कि हिंसा न करे। अगर कोर्ट से उन्हें कुछ चाहिए तो कोर्ट के आदेश का पालन करें। ये कह रहे हैं कि 26 जनवरी को 2000 ट्रैक्टर लेकर राजघाट पर आएंगे और रैली करेंगे। इससे गणतंत्र दिवस प्रभावित होगा।

दुष्यंत दवे: किसान ऐसा नहीं करने जा रहे हैं।

चीफ जस्टिस: हम पहले ही कह चुके हैं कि दिल्ली में कौन आएगा और कौन नहीं ये पुलिस तय करेगी। प्रदर्शन ऐसा होना चाहिए जो अंहिंसक हो महात्मा गांधी के सत्याग्रह की तरह प्रदर्शन होना चाहिए।

दवे: किसान की चिंता कर रहे हैं। महिलाओं और बुजुर्ग को कोई वहां लेकर नहीं आया बल्कि वह खुद आए हैं उनके अस्तीत्व का सवाल है। कई राज्यों में केंद्र के सत्ताधारी पार्टी की सरकार है और वहां से किसानों को आने से रोका जा रहा है।

चीफ जस्टिस: कानून के अमल पर स्टे और कानून पर स्टे अलग बाते हैं। हम कानून के अमल पर कभी भी स्टे कर सकते हैं।

अटॉर्नी: दवे ने कहा है कि किसान ट्रैक्टर लेकर नहीं आ रहे हैं रैली के लिए। ये बात रेकर्ड पर लिया जाए।

दवे: हर किसान के घर में फौजी है। गणतंत्र दिवस का उनके मन में सम्मान है। वह कभी नहीं कह रहे है कि गणतंत्र दिवस को वह प्रभावित करेंगे। किसानों को रामलीला मैदान में आने दिया जाए। सरकार इसकी भी इजाजत नहीं दे रही है। जेपी और अटल बिहारी बाजपेयी तक की ऐतिहासिक रैली वहीं हुई थी। राज्यसभा में किस तरह से बिल पास किया ये सबने देखा है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच 7 जनवरी को हुई आठवें दौर की बातचीत में भी कोई समाधान नहीं निकला था क्योंकि केंद्र सरकार ने विवादास्पद कानून निरस्त करने से इनकार कर दिया था दूसरी तरफ किसान नेताओं ने  भी कहा था कि वो अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ने के लिये तैयार हैं और उनकी “घर वापसी” सिर्फ “कानून वापसी” के बाद ही होगी, केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच 15 जनवरी को अगली बैठक प्रस्तावित है। 

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से भी कहा कि हम एक कमेटी बनाने औऱ कानून के अमल पर रोक लगाने पर विचार कर रहे हैं। 

आंदोलन जारी रखिए लेकिन अगर कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या किसान नागरिकों के लिए रास्ता छोड़ेंगे। हम बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं।

हम देश का सुप्रीम कोर्ट हैं और हम संवैधानिक जवाबदारी पूरी करेंगे।

हमें नहीं पता कि आंदोलन में लोग शारीरिक दूरी के नियम का पालन कर रहे हैं कि नहीं, हमें किसानों के भोजन पानी की चिंता है।

हम कानून की वैधता पर आदेश सभी पक्षो को सुनकर देंगे। 

समिति के समक्ष वार्ता का सुविधाजनक बनाने के लिए कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाई जा सकती है। अब देखना ये होगा कि सुप्रीम कोर्ट को भी सरकार सुनती है या नही, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाए केंद्र वरना हम लगाएंगे रोक।







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