जन्मदिन विशेष :जानिए एक ऐसे प्रधानमंत्री के बारे में जिसने देश को दो बार आर्थिक मंदी से निकाला और आम आदमी को दिया उसका सबसे बड़ा हथियार

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Reported by Awaaz Desk

On 26 Sep 2020
जन्मदिन विशेष :जानिए एक ऐसे प्रधानमंत्री के बारे में जिसने देश को दो बार आर्थिक मंदी से निकाला और आम आदमी को दिया उसका सबसे बड़ा हथियार

आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह अपना 88वा जन्मदिन मना रहे हैं।शांत स्वभाव के मनमोहन सिंह अपनी विनम्रता और सादगी के लिए जाने जाते है।आज़ाद भारत के इतिहास में मनमोहन सिंह को हमेशा आर्थिक मंदी के दौर से भारत को निकालने के लिए जाना जाता रहेगा आज भी देश की सत्तारूढ़ पार्टी को डॉ मनमोहन सिंह से आर्थिक संकट से उभरने के लिए सीखना चाहिए।


डॉ मनमोहन सिंह यूपीए कार्यकाल में 2004 से 2014 तक भारत के दो बार प्रधानमंत्री बने । डॉ मनमोहन सिंह आरबीआई के गवर्नर भी रहे और यूजीसी के अध्यक्ष भी रहे 1985 में राजीव गांधी के शासन काल में मनमोहन सिंह को भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया और 1990 में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार बनाए गए,जब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1999 में अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया, इसके अलावा वह वित्त मंत्रालय में सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।


अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह के जन्मदिन पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें आज हम आपको आवाज़24x7इंडिया के माध्यम से बताते हैं -


पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है।उन्होंने भारत मे पंजाब विश्वविद्यालय फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की साथ ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की,बहुत कम ही ये जानते है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भारत मे पंजाब विश्वविद्यालय के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी है।

1991-95 के दौर में डॉ मनमोहन सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान की। डॉ मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए विदेश व्यापार उदारीकरण, वित्तीय उदारीकरण, कर सुधार और विदेशी निवेश के अहम फैसले लिए,जिनकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को गति तो मिली ही साथ ही मजबूती भी मिली।डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही देश मे आर्थिक रूप से नई क्रांति पैदा हुई और भारतीय अर्थव्यवस्था को ग्लोबलाइजेशन की नई दिशा मिली।

2008 में जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही थी बड़े बड़े देशों के दिग्गज आर्थिक विशेषज्ञ भी सोच में पड़ गए हर जगह से जब मार्केट के गिरने की खबरें आ रही थी तब भारत की भी स्थिति बहुत खराब हो गयी थी निवेशकों के लाखों रुपये बर्बाद होने लगे थे लोगो के आगे रोजगार का संकट आ गया था नौकरियों का अकाल पड़ गया था,कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी थी तब डॉ मनमोहन सिंह की सूझबूझ से ही हालातो पर काबू पाया गया,घरेलू उपभोग की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में बिक्री को बनाये रखने के लिए उन्होंने बेहतर से बेहतर व्यवस्था करनी शुरू कर दी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार की हवा पहले ही टाइट होने लगी थी ऐसे में भारत की इतनी बड़ी आबादी के अर्थतंत्र को संभालने के लिए घरेलू बाजार को बनाकर रखना ही एकमात्र उपाय डॉ मनमोहन सिंह की सरकार को दिखाई दिया,हालांकि ये इतना आसान नही था क्योंकि निजी निवेश गिर रहा था। ऐसे हालातो पर जानकारों का मानना है कि जब आर्थिक संकट आता है तो हर देश में सरकार अपना खर्च बढ़ाने की कोशिश करती है क्योंकि उस वक़्त बेरोज़गारी और निवेश की समस्या होती है,अगर निजी क्षेत्र निवेश नहीं करता है तो सरकार को निवेश करना होगा। आर्थिक मंदी के उस दौर में डॉ मनमोहन सिंह ने अहम फैसले लिए कुछ नियमो में बदलाव किए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मंदी के वक्त उन्होंने भारत को दुनिया के बाज़ारो के लिए भी खोल दिया,इतना ही नही उन्होंने रोजगार के क्षेत्र में मनरेगा योजना को लाकर बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया,हर हाथ को काम मिले हर घर मे चूल्हा जले इस सोच के साथ डॉ मनमोहन सिंह ने मनरेगा योजना को लाकर रोजगार के क्षेत्र में बड़ी क्रांति लायी,इसकी वजह से ही लाखो लोगो को रोजगार मिला आज भी मनरेगा योजना के तहत लाखो लोगो का जीवन चल रहा है ।


आज  की अर्थव्यवस्था की अगर बात करें तो नोटबन्दी नाकाम साबित हुई जीएसटी ने ना जाने कितनों को डुबोकर रख दिया,तिमाही ग्रोथ रेट सबसे निचले स्तर पर आ पहुंची है कंस्ट्रक्शन और दूसरे सर्विस सेक्टर भी अब तेज़ी से काम नही कर पा रहे,भारत की कृषि ही सबसे बड़े आर्थिक संकट से जूझ रही है इंडस्ट्रियल उत्पाद सिकुड़ने लगा है,लॉक डाउन के बाद देश मे रोजगार का गहरा संकट छाने लगा है।


लेकिन आर्थिक मंदी के दौर में मनमोहन सिंह ने देश को बड़ी चतुराई के साथ संभाला उस दौर की बात करते हुए एक बार 

उन्होंने कहा था कि "उस मंदी का लंबा असर भी हुआ, ग्रोथ रेट भी गिरा, लेकिन इतना नहीं गिरा जितना हम अब देख रहे हैं, जबकि जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी तब वित्त मंत्री ने भी कहा था कि भारत बढ़िया स्थिति में है। तेल और मेटल के दाम गिर रहे थे, जिससे भारत को काफ़ी फ़ायदा हुआ,करंट अकाउंट डेफ़िसिट यानी चालू खाते का घाटा यानी निर्यात और आयात का अंतर कम था।डॉक्टर मनमोहन सिंह को आर्थिक सुधारों का जनक यूं ही नही कहा जाता।1991 में पीएम नरसिम्हा राव की जब कांग्रेस सरकार में वह वित्त मंत्री थे, यह वही दौर था जब देश दिवालिया होने के कगार पर था,तब जो उपलब्धियां उन्होंने देश के लिए हासिल की उनमें से कुछ आज आप भी जान लीजिए।


1- देश में आर्थिक सुधारों के एक्पर्ट -


देश का फिस्कल डेफिसिट यानी राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8.5 के इर्द गिर्द था।महज एक वर्ष के भीतर मनमोहन सिंह ने उसे 5.9 फीसदी के स्तर पर लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी, डॉ मनमोहन सिंह द्वारा लागू किए सुधार कार्यक्रमों के बाद डूबती हुई इकॉनमी ने वह मुकाम हासिल कर लिया कि उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा, 2004 से 2014 तक लगातार 10 साल देश के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने 1991 में जब देश के वित्त मंत्री का पद संभाला था तब आर्थिक क्रांति ला दी थी। इन्होंने ही ग्लोबलाइजेशन की शुरूआत की थी, 1991 से 1996 के बीच उनके द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों की जो रूपरेखा, नीति और ड्राफ्ट तैयार किया, उसकी दुनिया भर में प्रशंसा की जाती है। मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को बाकायदा एक ट्रीटमेंट के तौर पर पेश किया। भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार से जोड़ने के बाद उन्होंने आयात और निर्यात के नियम भी सरल किए।लाइसेंस और परमिट गुजरे वक्त की बात होकर रह गई। घाटे में चलने वाले पीएसयू के लिए अलग से नीतियां बनाईं। 


2- साल में 100 दिन का रोजगार पक्का रोजगार गारंटी मनरेगा योजना- 


बेरोजगारी से जूझते देश में रोजगार गारंटी योजना की सफलता का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है,इसके तहत साल में 100 दिन का रोजगार और न्यूनतम दैनिक मजदूरी 100 रुपये तय की गई, इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) कहा जाता था, लेकिन 2 अक्टूबर 2009 को इसका फिर से नामकरण किया गया,इसकी खास बात यह भी है कि इसके तहत पुरुषों और महिलाओं के बीच किसी भी भेदभाव की अनुमति नहीं है।इसलिए, पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन भुगतान किया जाना चाहिए, सभी वयस्क रोजगार के लिए आवेदन कर सकते है,इसके तहत यदि सरकार काम देने में नाकाम रहती है तो आवेदक बेरोज़गारी भत्ता पाने के हकदार होंगे।मनरेगा यानी महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट 2005, ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत यूपीए के कार्यकाल में डॉक्टर मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल में शुरू की गई थी।रोजगार गारंटी योजना दुनिया की सबसे बड़ी पहलों में से एक है, 2 फरवरी 2006 को 200 जिलों में शुरू की गई, जिसे 2007-2008 में अन्य 130 जिलों में फैलाया गया। 1 अप्रैल 2008 तक इसे भारत के सभी 593 जिलों में इसे लागू कर दिया गया। 

 2006-2007 में परिव्यय 110 अरब रुपए था, जो 2009-2010 में तेज़ी से बढ़ते हुए 391 अरब रुपए हो गया था जोकि 2008-2009 बजट की तुलना में राशि में 140% वृद्धि दर्ज की गई। 


3- आधार कार्ड योजना -


आधार कार्ड योजना की संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी की तारीफ

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की आधार योजना की यूएन ने भी तारीफ की थी। यूएन की और से कहा गया था कि आधार स्कीम भारत की बेहतरीन स्कीम है. जैसा कि हम और आप देख ही रहे हैं कि वर्तमान पीएम मोदी की सरकार में आधार संख्या को यूनीक नंबर होने के चलते विभिन्न कामों में अनिवार्य कर दिया गया है। भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण सन 2009 में मनमोहन सिंह के समय ही गठित किया गया जिसके तहत सरकार की इस बहुउद्देशीय योजना को बनाया गया।देश के हर व्यक्ति को पहचान देने और प्राथमिक तौर पर प्रभावशाली जनहित सेवाएं उस तक पहुंचाने के लिए इसे शुरू किया था आज पैन नंबर को इससे लिंक करना, आपके मोबाइल नंबर को लिंक करना, बैंक खातों से भी आधार को जोड़ा जाना बेहद जरूरी हो चुका है, यहां तक कि डेथ सर्टिफिकेट बनवाने के लिए भी आधार की जरूरत अनिवार्य कर दी गई है। 28 जनवरी 2009 को नोटिफिकेश जारी करके इसके लिए जो कार्यालय तैयार किया गया उसमें 115 अधिकारियों और स्टाफ की कोर टीम थी । 


4-न्यूक्लियर डील-मील का पत्थर-


साल 2002 में एनडीए से देश की बागडोर यूपीए के हाथ में जब गई,गठबंधन सरकार के तमाम प्रेशर के बीच भारत ने इंडो यूएस न्यूक्लियर डील को अंजाम दे दिया। 2005 में जब इस डील को अंजाम दिया गया उसके बाद भारत न्यूक्लियर हथियारों के मामले में एक पावरफुल नेशन बनकर उभरा,उस वक्त यूएस में जॉर्ज बुश प्रेजिडेंट हुआ करते थे, इस डील के तहत यह सहमति बनी थी कि भारत अपनी इकॉनमी की बेहतरी के लिए सिविलियन न्यूक्लियर एनर्जी पर काम करता रहेगा।

5-शिक्षा का अधिकार -


मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही राइट टु एजुकेशन यानी शिक्षा का अधिकार अस्तित्व में आया. इसके तहत 6 से 14 साल के बच्चे को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया, कहा गया कि इस उम्र के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी ही जाएगी।


6-आरटीआई एक्ट यानि सूचना का अधिकार लागू किया-


यूपीए सरकार ने आरटीआई एक्ट(RTI Act) लागू किया था, उस वक्त भारत दूसरे नंबर था,डॉ मनमोहन सिंह स्वयं इतने पारदर्शी थे अगर वो चाहते तो आरटीआई कभी लागू नही करते क्योंकि आरटीआई से उनकी पार्टी द्वारा किये गए भ्रष्टाचार भी उजागर होते लेकिन उन्होंने आरटीआई को लागू कर देश मे पारदर्शिता लाने का काम किया एक बार मनमोहन सिंह ने कहा था कि सरकारी अधिकारियों को चाहिए कि वे आरटीआई को किसी रोड़े के रूप में न देखें, बल्कि उसे इस रूप में लेना चाहिए कि यह हम सभी के लिए सामूहिक रूप से अच्छा है। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि ऐसी सूचनाएं जो सम्भवत: कोई सार्वजनिक उद्देश्य हल नहीं कर सकतीं, उनकी मांग करने के लिए इस कानून के हल्के व पीड़ादायक इस्तेमाल को लेकर चिंताएं हैं।


आज आर्थिक संकट के इस दौर में मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है,मनमोहन सिंह को विपक्ष के तौर पर ना देखते हुए आर्थिक विशेषज्ञ के तौर पर उनसे सलाह ली जा सकती है।आज आप देखिए आरबीआई की ब्याज़ दरें अब भी ज़्यादा है, बैंकों के ज़्यादा पैसा मुहैया कराया जा सकता है, लेकिन दिक्कत ये है कि बैंकों की हालत भी ख़राब है,पिछली मंदी का सामना करने वाली कंपनियां उनका पैसा लौटा नहीं पा रही हैं जिससे उनका संकट भी बढ़ गया है।कई कंपनियां ऐसी हैं जो रुपए तक नहीं लौटा पा रही हैं, ऐसे में बैंकों को पैसा देना बहुत ज़रूरी हो गया है ताकि वो आगे पैसा दे सकें।इसलिए सिर्फ मनमोहन सिंह ही इस समय देश को आर्थिक मंदी से बाहर निकालने का रास्ता दिखा सकते हैं इसलिए सरकार को उनकी बातों को सुनना चाहिए।

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